उत्तर प्रदेश में सरकारी भर्तियों की धीमी गति और लंबित प्रक्रियाओं से जुड़े मामले लगातार सामने आ रहे हैं। इसी कड़ी में, राज्य के आयुर्वेदिक अस्पतालों और कॉलेजों में 1002 फार्मासिस्ट पदों पर भर्ती का मामला भी दो साल से अधिक समय से अधर में लटका हुआ है। इस बहुप्रतीक्षित भर्ती के लिए अधिसूचना जारी हुए भले ही काफी समय हो गया हो, लेकिन अभी तक परीक्षा का आयोजन नहीं हो पाया है, जिससे हजारों उम्मीदवारों का भविष्य अनिश्चितता में है।
भर्ती प्रक्रिया में दो साल का लंबा इंतजार
जानकारी के अनुसार, लगभग दो साल पहले आयुर्वेद विभाग में 1002 फार्मासिस्टों की नियुक्ति के लिए एक अधिसूचना जारी की गई थी। इस विज्ञापन के बाद, 2000 से अधिक आयुर्वेद फार्मा डिग्री धारकों ने आवेदन किए, यह उम्मीद करते हुए कि परीक्षा जल्द होगी और उन्हें रोजगार मिलेगा। हालांकि, दो साल बीत जाने के बाद भी, आवेदकों को अभी तक परीक्षा में बैठने का अवसर नहीं मिला है। इस लंबी देरी ने उम्मीदवारों में भारी निराशा पैदा कर दी है।
मामला पहुंचा इलाहाबाद हाईकोर्ट, सरकार पर निष्क्रियता का आरोप
भर्ती प्रक्रिया में हो रही लगातार देरी के कारण अब यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गया है। अप्रैल 2024 में दायर एक याचिका में यह मांग की गई है कि इस भर्ती को पुराने नियमों के तहत पूरा किया जाए। उम्मीदवारों का आरोप है कि सरकार इस मामले में सक्रिय रूप से पैरवी नहीं कर रही है, जिससे सुनवाई में भी लगातार बाधा आ रही है।
- उम्मीदवारों की शिकायत: कोर्ट की तारीखें तो तय हो रही हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई प्रतिनिधि पैरवी के लिए उपस्थित नहीं होता।
- परिणाम: सुनवाई नहीं हो पाती और मामला आगे नहीं बढ़ पाता, जिससे भर्ती और भी लंबित होती जा रही है।
पुराने बनाम नए नियम: आखिर क्या है विवाद?
यह विवाद भर्ती नियमों में बदलाव से जुड़ा है।
- पुराने नियम (2023 से पहले): उत्तर प्रदेश में फार्मासिस्टों की भर्ती बैचवाइज की जाती थी। इसका अर्थ था कि जिन्होंने फार्मासिस्ट की डिग्री पूरी कर ली है, उन्हें पंजीकरण के आधार पर बैच के अनुसार नौकरी मिलती थी।
- नए नियम (27 अप्रैल 2023 को जारी): सरकार ने नियमों में बदलाव किया। अब फार्मासिस्ट की भर्ती भी PET (प्रारंभिक अर्हता परीक्षा) और विभागीय परीक्षा के आधार पर होनी है। फरवरी 2024 में जो भर्ती आई, वह इन्हीं नए नियमों के तहत थी।
आयुषी पटेल और संदीप श्रीवास्तव जैसे कई पुराने अभ्यर्थी अब मांग कर रहे हैं कि सरकार पहले पुराने नियमों के तहत बैकलॉग पदों को भरे और पुराने उम्मीदवारों को समायोजित करे, उसके बाद ही नए नियमों से नई भर्तियां निकाले। उनका कहना है कि सरकार अपनी ही निकाली गई भर्ती के लिए गंभीरता से काम नहीं कर रही है।
भविष्य की अनिश्चितता
यह स्थिति उन हजारों युवाओं के लिए चिंताजनक है, जिन्होंने इस भर्ती के लिए आवेदन किया था और नौकरी की उम्मीद लगाए बैठे थे। दो साल से अधिक का इंतजार और कोर्ट में सरकार की कथित निष्क्रियता ने उनके मनोबल को तोड़ दिया है। अब सभी की निगाहें इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी हैं, उम्मीद है कि जल्द ही इस सरकारी नौकरी भर्ती विवाद का कोई समाधान निकल पाएगा।