कर्नाटक में संक्रांति पर जानवरों को आग के बीच चलाने की प्रथा, उठा नया विवाद
कर्नाटक राज्य में हर साल मकर संक्रांति के पर्व पर एक पुरानी और विवादास्पद परंपरा देखने को मिलती है, जिसमें मवेशियों को जलती हुई आग के ऊपर से गुजारा जाता है। इस वर्ष भी ऐसी कई घटनाओं की खबरें सामने आई हैं, जिन्होंने पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और आम जनता के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। यह प्रथा, जिसे कुछ लोग सदियों पुरानी आस्था और शुभ मानते हैं, वहीं कई अन्य इसे जानवरों के प्रति क्रूरता करार देते हुए इसकी कड़ी निंदा कर रहे हैं।
क्या है यह परंपरा और क्यों है विवादों में?
संक्रांति के अवसर पर, विशेषकर ग्रामीण कर्नाटक के कुछ हिस्सों में, किसान अपने पशुधन, खासकर गायों और बैलों को सजाते हैं। इसके बाद, एक जगह पर लकड़ियों का ढेर लगाकर आग जलाई जाती है और फिर इन जानवरों को उस जलती हुई आग के छोटे से हिस्से के ऊपर से दौड़ने या चलने के लिए मजबूर किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, ऐसा करने से पशुओं को रोगों से मुक्ति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि आती है।
- पशु क्रूरता: आलोचकों का तर्क है कि यह प्रथा जानवरों को अनावश्यक भय और शारीरिक पीड़ा पहुंचाती है। आग की लपटें और गर्मी उनके लिए खतरनाक हो सकती हैं, जिससे उन्हें जलने या चोट लगने का खतरा रहता है।
- वैज्ञानिक आधार का अभाव: इस प्रथा का कोई वैज्ञानिक या तार्किक आधार नहीं है जो यह साबित कर सके कि इससे जानवरों को लाभ होता है या समृद्धि आती है।
- कानूनी उल्लंघन: भारत में पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 जैसे कई कानून हैं जो जानवरों को ऐसी पीड़ा पहुंचाने से रोकते हैं।
पशु अधिकार संगठनों की चिंताएं और कार्रवाई की मांग
पशु अधिकार संगठन, जैसे कि PETA इंडिया, लंबे समय से इस प्रथा को बंद करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह एक अमानवीय कृत्य है जो जानवरों के अधिकारों का उल्लंघन करता है। उन्होंने राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन से इस तरह की प्रथाओं पर तत्काल रोक लगाने और दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने का आग्रह किया है। उनका मानना है कि परंपराओं के नाम पर किसी भी जीव को कष्ट पहुंचाना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
सरकारी प्रतिक्रिया और आगे की राह
पिछले कुछ वर्षों में, इन घटनाओं के सामने आने के बाद सरकार और प्रशासन पर दबाव बढ़ा है। हालांकि, स्थानीय समुदायों में गहरी जड़ें जमा चुकी इस परंपरा को पूरी तरह से रोकना एक चुनौती बना हुआ है। कुछ अधिकारियों ने जागरूकता अभियान चलाने और लोगों को वैकल्पिक, पशु-अनुकूल तरीकों से त्योहार मनाने के लिए प्रेरित करने की बात कही है। यह देखना बाकी है कि इस लेटेस्ट रिपोर्ट के बाद सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या ठोस कदम उठाती है।
यह घटना एक बार फिर परंपरा और आधुनिक नैतिकता के बीच के संघर्ष को उजागर करती है। जहां एक ओर सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं का सम्मान महत्वपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर जीवों के प्रति मानवीय व्यवहार और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी समाज की जिम्मेदारी है।