पोप लियो ने ट्रंप की वेनेजुएला नीति पर जताई गंभीर चिंता: सैन्य बल के प्रयोग को बताया अनुचित
हाल ही में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वेनेजुएला को लेकर लिए गए निर्णयों पर पोप लियो ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सैन्य शक्ति का प्रयोग करना बिल्कुल अनुचित है। पोप ने इस बात पर जोर दिया कि दुनियाभर में युद्ध को बढ़ावा देने वाली मानसिकता तेजी से बढ़ रही है, जो कि चिंता का विषय है।
वैश्विक संघर्ष और कमजोर अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति पर पोप का बयान
अपनी वार्षिक विदेश नीति पर पोप लियो ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने वेटिकन में मौजूद 184 देशों के राजदूतों के समक्ष अपनी बात रखते हुए कहा कि आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संघर्षों से निपटने में वैश्विक संस्थाओं की कमजोरी एक गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने दुख व्यक्त किया कि अब संवाद और आपसी सहमति पर आधारित कूटनीति की जगह, बल प्रयोग पर आधारित नीतियां हावी हो रही हैं। पोप ने चेतावनी दी, "युद्ध एक बार फिर से प्रचलन में आ गया है और युद्ध का जुनून लगातार बढ़ता जा रहा है।"
वेनेजुएला में मानवाधिकारों के सम्मान की अपील
अमेरिकी मूल के पहले पोप लियो ने वेनेजुएला के मौजूदा हालात, खासकर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के संदर्भ में अपनी बात रखी। उन्होंने सभी सरकारों से अपील की कि वे वेनेजुएला की जनता की इच्छा का सम्मान करें। पोप ने यह भी कहा कि हर देश का यह दायित्व है कि वह वेनेजुएला के नागरिकों के मानवाधिकारों और उनके मौलिक नागरिक अधिकारों की पूरी तरह से रक्षा करे।
पोप लियो का पहला बड़ा संबोधन और अन्य मुद्दे
पोप फ्रांसिस के निधन के उपरांत पिछले वर्ष मई में चुने गए पोप लियो का यह पहला महत्वपूर्ण संबोधन था। इस अवसर पर अमेरिका और वेनेजुएला दोनों देशों के राजदूत भी मौजूद थे। अमेरिकी मूल के पोप लियो, जिनका वास्तविक नाम रॉबर्ट प्रेवोस्ट था, ने पोप चुने जाने से पहले पेरू में दशकों तक मिशनरी के रूप में कार्य किया था। अपने 43 मिनट के विस्तृत भाषण में, उन्होंने सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का नाम तो नहीं लिया, लेकिन उनकी नीतियों की कड़ी आलोचना की।
अपने संबोधन में, पोप लियो ने विश्वभर में चल रहे विभिन्न संघर्षों की घोर निंदा की। इसके अतिरिक्त, उन्होंने गर्भपात, इच्छामृत्यु (यूथेनेशिया) और सरोगेसी (किराए की कोख) जैसी संवेदनशील प्रथाओं पर भी अपनी आपत्ति व्यक्त की। उन्होंने पश्चिमी देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लगातार सिकुड़ने पर चिंता जताई और यूरोप तथा अमेरिका में ईसाइयों के खिलाफ बढ़ते धार्मिक भेदभाव की भी आलोचना की।