कानपुर देहात: दलित किशोरी की मौत, पुलिस की भूमिका पर गहरे सवाल
उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात में एक नाबालिग दलित लड़की के निधन ने पुलिस की कार्यप्रणाली, प्रशासन की जवाबदेही और न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। तीन महीने तक जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करने के बाद, इस बच्ची ने आखिरकार इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। परिवार का आरोप है कि इतने जघन्य अपराध, जैसे कि दुष्कर्म, में पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने के बजाय थाने में ही एक पंचायत बुलाई, पैसों का लेनदेन करवाया और समझौता करा दिया। जब यह मामला सार्वजनिक हुआ और पीड़िता की हालत लगातार बिगड़ती चली गई, तब जाकर आनन-फानन में मुकदमा दर्ज किया गया और आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।
रूरा थाना क्षेत्र का दर्दनाक मामला
यह हृदय विदारक घटना रूरा थाना क्षेत्र के अमौली ठकुरान गांव की है। आरोप है कि 15 अक्टूबर 2025 को गांव के ही एक युवक ने दलित समुदाय की नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म किया। वारदात के बाद जब बच्ची घर लौटी, तो उसकी स्थिति बेहद नाजुक थी और लगातार रक्तस्राव हो रहा था। घबराए परिजन उसे तुरंत अस्पताल लेकर पहुंचे। पहले उसे स्थानीय अस्पताल ले जाया गया, फिर जिला अस्पताल और अंततः कानपुर के हैलट अस्पताल में रेफर किया गया।
पुलिस पर समझौते का गंभीर आरोप
परिजनों का कहना है कि इसी दौरान पीड़िता के पिता रूरा थाने पहुंचे और दुष्कर्म का मामला दर्ज करने की मांग की, लेकिन पुलिस ने एफआईआर लिखने के बजाय थाने में ही 'पंचायत' बैठा दी। आरोप है कि पुलिस की उपस्थिति में आरोपी पक्ष से 3 लाख 50 हजार रुपये दिलवाए गए। एक स्टांप पेपर पर लिखित समझौता करवाया गया, इस लेनदेन का वीडियो भी बनाया गया और यह स्वीकारोक्ति ली गई कि भविष्य में कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जाएगी।
इलाज के लिए लंबी जद्दोजहद और अंततः मौत
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान बच्ची की तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी। तीन महीने तक उसे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाया गया। परिजन बताते हैं कि:
- शुरुआत में रूरा के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया।
- फिर जिला अस्पताल भेजा गया।
- हालत गंभीर होने पर कानपुर नगर रेफर किया गया।
- वहां से लाला लाजपत राय अस्पताल, उर्सला अस्पताल, झांसी मेडिकल कॉलेज, कानपुर के निजी नर्सिंग होम, अनंतराज हॉस्पिटल और अंततः लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) तक बच्ची को ले जाया गया।
इलाज की इस लंबी और थका देने वाली दौड़ के बावजूद, उसकी जान नहीं बचाई जा सकी।
पुलिस का पक्ष और विरोधाभासी बयान
इस पूरे मामले पर कानपुर रेंज के आईजी हरिश्चंद्र का कहना है कि शुरुआत में मामला पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज किया गया था, लेकिन जांच में यह सामने आया कि लड़की नाबालिग नहीं, बल्कि 19 साल की बालिग थी। उनके मुताबिक, मेडिकल रिकॉर्ड के आधार पर पीड़िता की उम्र 19 साल पाई गई है। आईजी का यह भी कहना है कि पीड़िता के पिता लगातार अपने बयान बदल रहे थे। जैसे ही पुलिस को एक ठोस शिकायत मिली, थानाध्यक्ष ने तुरंत रिपोर्ट दर्ज कर दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ वीडियो वायरल होने के बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए एक जांच कमेटी का गठन किया गया है, जो पुलिस की भूमिका की भी पड़ताल करेगी। यदि किसी भी स्तर पर पुलिस की संलिप्तता पाई जाती है, तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
वहीं, कानपुर देहात पुलिस की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि थाने में किसी प्रकार का समझौता नहीं कराया गया। पुलिस का दावा है कि आरोपी और पीड़ित पक्ष के बीच जो भी समझौता हुआ, वह थाने के बाहर समाज के लोगों की मौजूदगी में हुआ था। उस वक्त पुलिस को यह बताया गया था कि दोनों पक्ष एक-दूसरे को जानते हैं और लड़की के साथ केवल मारपीट की घटना हुई थी। उसी आधार पर समझौते की बात सामने आई थी। पुलिस का यह भी कहना है कि बलात्कार की लिखित शिकायत परिवार की ओर से बाद में दी गई, जिस पर तत्काल कार्रवाई करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। पुलिस के अनुसार, समझौते की बात असत्य है और पूरे मामले में तथ्य धीरे-धीरे सामने आए, जिससे भ्रम की स्थिति बनी।
मामले में कई अनसुलझे सवाल
हालांकि, इस पूरे प्रकरण में कई विरोधाभास भी सामने आ रहे हैं।
- एक तरफ पुलिस पीड़िता को बालिग बता रही है, वहीं शुरुआती मेडिकल जांच और परिजनों के दावों में उसे नाबालिग बताया गया।
- दूसरी ओर, पीड़िता के पिता के अलग-अलग वीडियो बयान भी सामने आए हैं, जिनमें उनके कथनों में स्पष्ट अंतर दिखता है।
इन विरोधाभासों ने इस संवेदनशील मामले को और भी उलझा दिया है, जिससे न्याय की उम्मीद लगाए बैठे परिवार की मुश्किलें बढ़ गई हैं।