अक्सर राजनीतिक गलियारों में विधायकों की खरीद-फरोख्त और दलबदल को लेकर गरमागरम चर्चाएँ होती रहती हैं। चाहे महाराष्ट्र हो, मध्य प्रदेश हो या कर्नाटक, सत्ता परिवर्तन के दौरान ऐसी बातें आम हो जाती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि किसी राजनीतिक दल को अपना एक विधायक विधानसभा तक पहुँचाने में असल में कितना पैसा खर्च करना पड़ता है? बिहार के संदर्भ में, 2025 के विधानसभा चुनाव से जुड़ी खर्च की रिपोर्टें अब सामने आई हैं, जो इस सवाल का दिलचस्प जवाब देती हैं।
बिहार चुनाव 2025: चुनावी खर्च का लेखा-जोखा
2025 बिहार विधानसभा चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा किए गए खर्च का विवरण चुनाव आयोग को सौंप दिया गया है। इन रिपोर्टों से पता चलता है कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने सबसे अधिक धन खर्च किया है। हालांकि, जनता दल (यूनाइटेड) और राष्ट्रीय जनता दल ने अभी तक अपने खर्च का हिसाब जमा नहीं किया है, जिसके कारण उनके वित्तीय आंकड़े उपलब्ध नहीं हो पाए हैं।
प्रमुख दलों का चुनावी खर्च
आइए देखते हैं कि बिहार चुनाव में किस पार्टी ने कितना खर्च किया:
- बीजेपी: भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनाव अभियान पर कुल 146.71 करोड़ रुपये खर्च किए। यह राशि कांग्रेस के कुल खर्च से चार गुना से भी अधिक है। दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी ने अपनी कुल पूंजी का मात्र 2% ही इस चुनाव में लगाया, जबकि कांग्रेस ने अपनी कुल जमा पूंजी का 28% खर्च कर दिया। बीजेपी बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जो उनके भारी-भरकम खर्च का एक संभावित परिणाम हो सकता है। चुनाव आयोग को दी गई रिपोर्ट के अनुसार, सबसे ज्यादा खर्च स्टार प्रचारकों के आवागमन और मीडिया विज्ञापनों पर हुआ।
- कांग्रेस: कांग्रेस पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनाव अभियान में 35.07 करोड़ रुपये खर्च किए। इसमें उम्मीदवारों के प्रचार, स्टार प्रचारकों की यात्रा और अन्य चुनावी गतिविधियों पर हुआ व्यय शामिल है।
- मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M): सीपीआई (एम) का चुनावी अभियान खर्च 26.75 लाख रुपये रहा।
- बहुजन समाज पार्टी (BSP): बीएसपी ने बिहार चुनाव पर कुल 6.01 करोड़ रुपये खर्च किए।
किस पार्टी को कितने का पड़ा एक विधायक?
चुनावी खर्च और जीती गई सीटों के आधार पर, हम यह गणना कर सकते हैं कि प्रत्येक पार्टी को अपना एक विधायक विधानसभा पहुँचाने में औसतन कितना खर्च करना पड़ा।
बीजेपी को एक विधायक की लागत
बीजेपी ने बिहार चुनाव में 101 सीटों पर चुनाव लड़ा और एनडीए गठबंधन के तहत 89 विधायक जीतने में सफल रही। पार्टी ने अपने प्रचार के दौरान गूगल इंडिया को विज्ञापन के लिए 14.27 करोड़ रुपये का भुगतान किया। इसके अतिरिक्त, उम्मीदवारों को आर्थिक सहायता के तौर पर 29.71 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
कुल 146.71 करोड़ रुपये खर्च करके 89 विधायक हासिल करने के बाद, बीजेपी को प्रति विधायक लगभग 1.65 करोड़ रुपये का खर्च आया।
कांग्रेस के एक विधायक की कीमत
कांग्रेस ने अपने 35.07 करोड़ रुपये के कुल चुनावी खर्च में से 12.83 करोड़ रुपये स्टार प्रचारकों के आवागमन पर और 11.24 करोड़ रुपये सोशल मीडिया अभियान पर खर्च किए। चुनाव की घोषणा से पहले हुए खर्चों का अनुमान लगाना मुश्किल है, और यह बात सभी दलों पर लागू होती है। कांग्रेस ने बिहार में 61 उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन केवल 6 सीटों पर ही जीत हासिल कर पाई। राहुल गांधी के नेतृत्व में निकाली गई 'वोटर अधिकार यात्रा' और पटना में हुई कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक पर भी अच्छा-खासा खर्च हुआ होगा, जिसका सीधा ब्योरा चुनावी खर्च में नहीं दिखता।
इस प्रकार, कांग्रेस ने 35.07 करोड़ रुपये खर्च करके 6 विधायक जीते, जिससे प्रति विधायक का खर्च लगभग 5.84 करोड़ रुपये रहा।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) के विधायक का खर्च
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को महागठबंधन में 4 सीटें मिली थीं, लेकिन जीत केवल एक सीट पर ही हासिल हुई। सीपीआई (एम) ने बिहार चुनाव पर कुल 26.75 लाख रुपये खर्च किए थे।
एक विधायक जीतने के लिए 26.75 लाख रुपये खर्च करने के बाद, सीपीआई (एम) को प्रति विधायक 26.75 लाख रुपये का खर्च आया।
बीएसपी को एक विधायक कितने का पड़ा?
मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने बिहार चुनाव में 181 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, लेकिन जीत केवल एक उम्मीदवार को ही मिल पाई। बीएसपी ने अपने अभियान पर कुल 6.01 करोड़ रुपये खर्च किए।
इस तरह, बीएसपी ने 6.01 करोड़ रुपये खर्च करके 1 विधायक जीता, जिससे उनके एकमात्र विधायक का खर्च 6.01 करोड़ रुपये रहा।
निष्कर्ष: सबसे महंगा और सबसे सस्ता विधायक
चुनाव खर्चों के इस विस्तृत विश्लेषण से पता चलता है कि बिहार चुनाव में सबसे महंगा विधायक मायावती की बहुजन समाज पार्टी को पड़ा, जिसकी लागत 6.01 करोड़ रुपये थी। वहीं, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने सबसे किफायती विधायक हासिल किया, जिसकी लागत केवल 26.75 लाख रुपये रही। यह रिपोर्ट भारतीय लोकतंत्र में चुनावी खर्चों की जटिलता और विभिन्न राजनीतिक रणनीतियों के वित्तीय परिणामों पर एक महत्वपूर्ण प्रकाश डालती है।